वृंदावन के इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव रात में नहीं मनाते,है लोग ये है परंपरा..

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बिहार – भगवान श्री कृष्णा का एक ऐसा मंदिर भी है जहा दिन में पूजा अर्चना की जाती है चलिए इस से पहले जानते है,भगवान श्री कृष्णा के बारे में कुछ.

श्री कृष्णा जन्माष्टमी हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। इस त्योहार को हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की आष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो हिन्दू पंचांग के अनुसार अगस्त या सितंबर महीने में पड़ती है।

श्रीकृष्ण के जन्म की कथा महाभारत के श्रीमद्भगवद गीता और भगवद पुराण में मिलती है। जन्माष्टमी के दिन, भगवान के जन्म स्थल मथुरा और वृंदावन में खास धार्मिक आयोजन होते हैं। इन जगहों पर मंदिरों में भगवान की मूर्तियां सजाई जाती हैं, और भक्तगण उन्हें देखने के लिए आते हैं।

जन्माष्टमी के दिन भक्तगण व्रत करते हैं, मंदिरों में आरती और भजन करते हैं, और भगवान के लीलाओं का पाठ करते हैं। रात को, भगवान के जन्म के समय पूजा अद्वितीय मानी जाती है, और उस समय मक्खन, दही, फल, और मिश्री से बनी खास प्रसाद को चढ़ाया जाता है, जिसे नंदोत्सव कहा जाता है। भगवान की मूर्ति पर दुपहर को अद्वितीय रूप से सजाई जाती है और उसका बालक रूप में दर्शन किया जाता है।

जन्माष्टमी के दिन, भक्तगण कृष्ण की लीलाओं के विचार में डॉले जाते हैं और उनके जीवन के महत्वपूर्ण संदेशों को याद करते हैं, जैसे कि भगवान कृष्ण ने भगवद गीता के माध्यम से दिया।

श्री कृष्णा जन्माष्टमी भारत के विभिन्न हिस्सों में धूमधाम से मनाया जाता है और लोग इसे खुशी खुशी मनाते हैं। यह एक धार्मिक त्योहार होने के साथ-साथ एक पर्व होता है जिसमें सोशल और कला की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा में जन्म लिया और दूसरे दिन जन्मोत्सव की खुशियां गोकुल में मनाई गईं । मथुरा गोकुल सहित देश दुनिया में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव रात में होता है । वृंदावन के ठा. राधारमण मंदिर में आराध्य श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव दिन में मनाया जाता है । यहां ठाकुरजी का विग्रह दिन में प्रकट हुआ था । देश दुनिया में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव रात 12 बजे मनाया जाता है । लेकिन, सप्तदेवालयों में शामिल ठा. राधारमण मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव दिन में मनाया जाता है । यह परंपरा आराध्य राधारमणलालजू के प्राकट्यकर्ता आचार्य गोपालभट्ट गोस्वामी ने शुरू की । चूंकि, आचार्य गोपालभट्ट की साधना से प्रसन्न होकर शालिग्राम शिला से ठा. राधारमणलालजू ने विग्रह रूप भोर में लिया था । इसलिए मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भी आचार्य गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा दिन में ही मनाया जाता था ।

आज भी आचार्य गोपाल भट्ट गोस्वामी के वंशज दिन में ही भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं । इसके अलावा राधादामोदर मंदिर, शाहजी मंदिर में भी दिन में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है । श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर सात सितंबर को मंदिर में सुबह 9 बजे ठाकुरजी का सवामन दूध, दही, घी, बूरा, शहद, यमुनाजल, गंगाजल व जड़ी- बूटियों से महाभिषेक होगा ।

निधिवन राज मंदिर के समीप स्थित ठा. राधारमण मंदिर में मान्यता है कि करीब 479 वर्ष पहले चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी आचार्य गोपाल भट्ट गोस्वामी के प्रेम के वशीभूत होकर ठा. राधारमणलालजू शालिग्राम शिला से वैशाख शुक्ल पूर्णिमा की प्रभातबेला में प्रकट हुए थे । दिन में ही मनाने की परंपरा आचार्य गोपाल भट्ट की इच्छा शालिग्राम शिला में ही गोविंददेव जी का मुख, गोपीनाथजी का वक्ष स्थल और मदनमोहनजी के चरणारविंद के दर्शन की थी । भगवान नृसिंह देव के प्राकट्य दिवस पर आचार्य गोपालभट्ट गोस्वामी ने अपने आराध्य से यह इच्छा जताई थी । इस पर आचार्य गोपाल भट्ट की साधना से प्रसन्न होकर वैशाख शुक्ल पूर्णिमा की भोर में शालिग्राम शिला से ठा. राधारमणलालजू का प्राकट्य हुआ । तब से भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्योत्सव भी दिन में ही मनाया जाता है ।

यह परंपरा खुद आचार्य गोपाल भट्ट गोस्वामी ने ही शुरू की ।’ वैष्णवाचार्य शरदचंद्र गोस्वामी, मंदिर सेवायत । मंदिर की रसोई का ही अर्पित होता है प्रसाद राधारमण मंदिर की रसोई में सेवायत खुद अपने हाथ से ठाकुरजी का प्रसाद तैयार करके भोग में अर्पित करते हैं । मंदिर की रसोई में किसी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है । माचिस का नहीं होता प्रयोग मंदिर की परंपरा के अनुसार किसी भी कार्य में माचिस का प्रयोग नहीं होता । पिछले 479 साल से मंदिर की रसोई में प्रज्वलित अग्नि से ही रसोई समेत अनेक कार्य संपादित होते हैं ।